‘24’ में भी ‘लूटा’, ‘25’ में भी ‘लूटा’ 26' में भी लूटेंगे
- Posted By: Tejyug News LIVE
- क्राइम
- Updated: 1 January, 2026 19:25
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‘24’ में भी ‘लूटा’, ‘25’ में भी ‘लूटा’ 26' में भी लूटेंगे
बस्ती। पिछले कई सालों से भ्रष्टाचारियों के नाम रहता आ रहा साल। साल तो बदल जाते हैं, लेकिन जिले को लूटने वाले नहीं बदलते। पूरे साल सदन से लेकर सड़क तक, ग्राम पंचायत से लेकर जिला पंचायत तक और ब्लॉक से लेकर विकास भवन तक सिर्फ और सिर्फ भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों का ही बोलबाला रहा। यही स्थित बीडीए कीभी रही, यहां पर तो पूरी तरह भ्रष्टाचारियों का कब्जा रहा। लूटने पाटने का जो सिलसिला आज से आठ साल पहले शुरु हुआ, वह आज भी हो रहा। यहां के चार-पांच मेट, प्रभारी एक्सईएन, एई और जेई मिलकर हजारों भवन स्वामियों को इतना लूटा कि वे कंगाल हो गए। भवन की लागत से अधिक उनका चढ़ावा में चला गया। नगर पंचायतों में तो मानो लूटने की खुली छूट रही हो। जो लोग अपने आप को ईमानदार कहते हुए नहीं थकते थे, उन्हीं लोगों ने सबसे अधिक लूटपाट किया। रही बात क्षेत्र पंचायतों की तो यहां के नकली प्रमुखों ने लूट का ऐसा रिकार्ड बनाया, जिसे असली शायद ही कभी तोड़ पाए। जिला पंचायत को तो संगठित गिरोह की तरह लूटा गया। 100-50 करोड़ की लूट नहीं बल्कि सैकड़ों करोड़ की लूट हुई, जिला पंचायत अध्यक्ष से लेकर एएमए और जिला पंचायत सदस्यों ने लूटा। लूट के मामले में शायद ही कोई पीछे रह गए हो। लूट पाट के लिए जो ब्लैकमेल का रास्ता अपनाया गया, उसे जिले वाले कभी नहीं भूल पाएगें, और इस साल जब कार्यकाल समाप्त होगा तो पूरे कार्यकाल को काला अध्याय के रुप में जाना जाएगा। कितने सदस्य दूबारा जिले के सबसे बड़े सदन में दिखाई देगें, इसकी कोई गांरटी नहीं दे रहा है। वे भी गांरटी नहीं दे पा रहे हैं, जिनकी अगुवाई में जिला पंचायत बर्बाद हुआ। सदस्यों को भ्रष्ट बनाने में ब्लैकमेल करने वाले मुखिया का बहुत बड़ा हाथ रहा। सदस्य पैसे के लिए इतना नीचे तक जा सकते हैं, यह सच क्षेत्र की जनता ने अवष्य देखा होगा। कुछ ऐसे भी हैं, जो जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठने और विधायक बनने का सपना देख रहे हैं। अगर कोई ईमानदार सपना देखे तो समझ में आता है, लेकिन अगर कोई ब्लैकमेलर सपना देखे तो किसी के समझ में नहीं आएगा। बहरहाल, जिला पंचायत को जितना लूटना था, लूट लिया, जितना ब्लैकमेल करना था, कर लिया, अब तो छोड़ दीजिए। जिला पंचायत का लगभग अब तक पूरा कार्यकाल भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों के हवाले रहा। जिले के लोगों को इस बात की हैरानी हो रही है, कि अरबों की लूट हो गई, और प्रशासन मूकदर्शक बना रहा। जिन नेताओं ने विरोध किया, वह भी बाद में न जाने क्यों शांत हो गए। पूरे साल किसान कभी धान, तो कभी गेहूं, तो कभी खाद तो कभी गन्ना घटतौली को लेकर चिल्लाता और रोता रहा, लेकिन नेता और अधिकारी खामोश रहें, अधिकारियों के चुप होने की तो बात समझ में आती है, क्यों कि यह तो मेहमान बनकर आते और चले जाते हैं, इनसे किसानों के दुख और पीड़ा से कोई सरोकार नहीं होता, लेकिन नेताओं का चुप रहना इस लिए समझ में नहीं आता, क्यों कि इन्हें तो किसानों के बीच में रहना और चुनाव में जाना है। आखिर यह लोग 27 में क्या मुंह लेकर किसानों के पास जाएगें? किसानों के नाम पर जिला कृषि अधिकारी से लेकर एआर तक और पीसीएफ के डीएस से लेकर सचिव तक लूटते रहें। जिले में इतना बड़ा धान का घोटाला हो गया, फिर भी किसी ने कोई सबक नहीं लिया, बल्कि और तेजी से लूटपाट यह सोचकर करने लगे, कि जब उन लोगों का नाम भ्रष्टाचारी में शामिल हो ही गया तो क्यों न जितना हो सके, लूट लें। जिले में इतना सबकुछ हो गया, लेकिन प्रषासन का इकबाल नहीं दिखा। जिले के लोगों को जितना प्रशासन पर भरोसा था, उतना पूरा नहीं हुआ। जिले के मुखिया की ओर से एक भी मामले में ऐसी कोई बड़ी कार्रवाई नहीं की गई, जिससे प्रशासन के होने का एहसास लोगों को हो सके। कोडिन सीरप के मामले में भी प्रशासन ने उन लोगों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं किया, जिससे यह पता चल सके, कि प्रशासन इस मामले में कितना गंभीर है। इस मामले में मीडिया की ओर से सवाल भी किए गए, लेकिन जबाव और कार्रवाई के बजाए नाराजगी जताई गई। साल के अंतिम दिनों में जिस तरह चंद लोगों ने जिले के माहौल को खराब करने का प्रयास किया, उससे जिले की छवि खराब हुई। रेडक्रास सोसायटी का जिक्र न हो, यह हो नहीं हो सकता। जिस रेडक्रास सोसायटी के क्रियाकलापों को लेकर पूरे दुनिया में चर्चा होती रही, वहीं बस्ती में पहली बार हुए चुनाव और उसके बाद के क्रियाकलापों की भी खूब चर्चा हुई। कहा गया कि चंद लोगों के कारण रेडक्रास सोसायटी का मकसद पूरा नहीं हो पाया, जिस रेडक्रास सोसायटी को लोग कोरोना काल में जानते हैं, वह पहचान अब कहीं खो सा गया है। जिस तरह यह संगठन और इसके सभापति सहित अन्य पदाधिकारी विवादों के घेरे में रहे, वह काफी चर्चा का विषय रहा। जिले के लोगों ने यह भी देखा कि लोग जितना पद के लिए लालायित रहते उतना सेवा करने के लिए नहीं। चुनाव जीत कर पदाधिकारी बन जाना अलग बात हैं, और पदाधिकारी बनकर दिखाना अलग बात है। इसी लिए बार-बार कहा जा रहा हैं, कि पद मोह छोड़कर समाज सेवा में लग जाइए, और इस सेवा में चंद लोग ही न लगे, बल्कि पूरी टीम लगे, तभी खोई हुई प्रतिष्ठा वापस आ सकती है। वरना यूं ही अविष्वास प्रस्ताव आते रहेगें।

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