आखिर ‘अवैध’ निर्माण ‘का’ जिम्मेदार ‘कौन’?
- Posted By: Tejyug News LIVE
- राज्य
- Updated: 1 January, 2026 19:54
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आखिर ‘अवैध’ निर्माण ‘का’ जिम्मेदार ‘कौन’?
बस्ती। जिले की जनता पिछले लगभग आठ सालों से यह जानना चाह रही है, कि आखिर अवैध निर्माण के लिए कौन जिम्मेदार? भवन स्वामी, बीडीए का सख्त नियम कानून या फिर बीडीए के जिम्मेदार? यह भी सवाल उठ रहा है, कि आखिर इतने सालों में बीडीए को क्या लाभ हुआ? देखा जाए तो बीडीए के हाथ तो कुछ नहीं लगा, अलबत्ता बीडीए के जिम्मेदारों की लाटरी अवष्य निकल गई। सबसे अहम सवाल कि आखिर बीडीए का खजाना इतने सालों में क्यों खाली रहा? और बीडीए के जिम्मेदारों की तिजोरी कैसे भर गई? किसने तिजोरी भरी और इसके पीछे उसकी क्या मंशा रही? रही बात तिजोरी भरने वाले धन्ना सेठों की तो उन्होंने भी कोई शोक से बीडीए वालों की तिजोरी को नहीं भरा, बल्कि बीडीए के नियम कानून ने उन्हें भरने के लिए मजबूर कर दिया, वरना कौन कमबख्त अवैध निर्माण के चक्कर में पड़ कर रातों की नींद हराम करना चाहेगा? नुकसान तो सबसे अधिक भवन स्वामियों का ही हुआ। यह भी सच है, कि अगर बीडीए का नियम कानून सरल होता तो बीडीए का विकास भी होता और सरकारी खजाना भी भरता। तब कोई अधिकारी यह नहीं कहता कि उन्होंने बस्ती से जितना कमाया, उतना पूरी नौकरी में भी नहीं कमाया। इसी लिए बार-बार भवन स्वामियों की ओर से यह कहा जा रहा है, कि जब तक सरकार बीडीए के नियम कानून को भवन स्वामियों के हित में नहीं बनाएगी, तब तक अवैध निर्माण होते रहेंगे, और पंकज पांडेय जैसे लोग जिले को लूटते रहेगें। अनेक अवैध निर्माण को अंजाम देने वाले भवन स्वामियों का कहना है, कि उन्होंने शौक से अवैध निर्माण नहीं करवाया, बल्कि बीडीए के नियम कानून ने उन्हें मजबूर किया। सवाल के लहजे और अपना दर्द बयां करते हुए कहते हैं, कि अगर कोई कारोबारी रोजगार के लिए किसी भवन का निर्माण करता है, और इसी बीच बीडीए वाले आकर खड़े हो जाते हैं, और कहते हैं, कि निर्माण बंद करो, नहीं तो सील कर दूंगा। ऐसे में वह कारोबारी जिसने बैंक से लोन लेकर भवन बनाना चाह रहा है, क्या करेगा? जाहिर सी बात हैं, वह गलत रास्ता ही चुनेगा, क्यों कि उसे अपने धन के साथ इज्जत की भी चिंता रहती है, तब वह पंकज पांडेय, संदीप कुमार, हरिओम गुप्त, अरुण कुमार शर्मा, आरसी शुक्ल, केडी चौधरी जैसे लोगों के पास नोटों की गडडी लेकर जाता है, और कहता है, कि चाहें जितना पैसा लग जाए, लेकिन निर्माण नहीं रुकना चाहिए। ऐसे में इनकी सबसे अधिक मदद आउटसोर्सिंग वाले मेट करते हैं। जब इन सभी को अपना-अपना हिस्सा मिल जाता है, तो अवैध निर्माण भी पूरा हो जाता हैं, और कोई नोटिस भी नहीं जाती, और न सील ही होता है। अगर जेई अनिल कुमार त्यागी के कारण सील भी हो भी गया तो रातों-रात खुल भी जाता है, यह अलग बात हैं, सील खोलने के लिए कोई लिखित में आदेश नहीं होता। अब जरा अंदाजा लगाइए कि बाजार स्टीट यानि गंाधीनगर में अगर किसी को प्रतिष्ठान का निर्माण करना है, और उसके पास कुल 100 फिट. ही जमीन हैं, और अगर उसने बीडीए के नियम कानून का पालन किया तो उसे सबसे पहले 100 में 60 फीट बीडीए के लिए छोड़ना पड़ेगा, तभी उसका मानचित्र स्वीकृति होगा, पहले 60 था, अब 50 फिट छोड़ने का नियम हैं, तो क्या वह 50 फिट जमीन छोड़ पाएगा, अगर उसने छोड़ भी दिया तो 40 या 50 फिट में कौन सी दुकान का निर्माण हो जाएगा? अब इसी 40 या 50 फिट बचाने के लिए वह 20-25 फिट जमीन की कीमत बीडीए के भ्रष्ट लोगों को देने के लिए तैयार हो जाता है। हालांकि 10-20-50 लाख देने के बाद भी दुकानदार बीडीए की नजर में चोर ही कहलाएगा। आज आप लोग जो गांधीनगर में अवैध निर्माण देख रहे हैं, उसके लिए भवन स्वामियों को करोड़ों का चढ़ावा बीडीए के लोगों को चढ़ाना पढ़ा। बीडीए वाले भी उन अवैध निर्माण करने वालों के प्रति पूरी ईमानदारी दिखाते हैं, जिसने चढ़ावा चढ़ा दिया। अब जरा अंदाजा लगाइए कि दो हजार से अधिक आवास, प्रतिष्ठान, नर्सिगं होम और होटलर्स का अवैध निर्माण हो गया, लेकिन आज तक एक भी अवैध निर्माण को बीडीए वालों ने नियमानुसार ध्वस्तीकरण की कार्रवाई नहीं किया। इतना ही नहीं जो सरकारी कर्मचारी बीडीए वाले की काली कमाई में रोड़ा बनते हैं, उन्हें यह लोग रास्ते से हटाना भी जानते है। जैसे इन लोगों जेई अनिल कुमार त्यागी को हटा दिया। एक कारोबारी का कहना था, कि किसी भी भवन स्वामी को उस समय अच्छा नहीं लगेगा, जब कोई जेई आता है, और डायरी और पेन निकालकर नाम और पता पूछने लगता हैं, जाहिर सी बात हैं, कि अगर ऐसे में कोई कारोबारी हमला करता है, तो वह गलत नहीं करता, भले ही चाहें कानून की निगाह में गलत ही क्यों न हो? हां अगर कोई ईमानदार सवाल जबाव करता है, तो उसका सम्मान करना चाहिए। ईमानदारी और बेईमानी दोनों एक साथ नहीं चलेगी। कहते हैं, कि जब पूरा बीडीए ही बेईमान हैं, तो ऐसे लोगों के प्रति हमदर्दी कैसी और क्यों? जब नोटों की गडडी ही देनी है, तो ऐसे लोगों से लगाव कैसा? अब जरा अंदाजा लगाइए कि बीडीए के पहले कितना विकास होता था, और अब कितना हो रहा है। कहा भी जाता है, कोई भी विकास सरल नियम कानून से होता है। लेकिन यहां पर तो सरकार ने नियम कानून को इतना सख्त बना दिया, कि विकास ही ठप्प हो गया, ऐसे नियम कानून से क्या फायदा जो लोगों को अवैध निर्माण करने को मजबूर करे।

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