आखिर ‘बस्ती’ के ‘डीओ’ पर ‘कब’ गिरेगी ‘गाज’?

आखिर ‘बस्ती’ के ‘डीओ’ पर ‘कब’ गिरेगी ‘गाज’?

आखिर ‘बस्ती’ के ‘डीओ’ पर ‘कब’ गिरेगी ‘गाज’?

बस्ती। खाद की कालाबाजारी करने और करवाने वालों के खिलाफ मंत्रीजी की दोहरी नीति बस्ती के किसानों की समझ में नहीं आ रहा है। देखा जाए, तो खाद की कालाबाजारी का केंद्र बस्ती रहा, और इसके सूत्रधार जिला कृषि अधिकारी और एआर कोआपरेटिव रहे। खाद के जो होलसेलर्स बस्ती के हैं, वही जनपद सिद्धार्थनगर के भी है। हाल ही में जो छह हजार बोरी खाद की कालाबाजारी एक रिटेलर के नाम पर हुई, और लीपापोती की गई, उसे पूरे जिले के किसानों ने देखा। बार-बार किसान, मंत्रीजी और प्रशासनिक अधिकारियों से सवाल कर रहा है, कि आखिर कब बस्ती के जिला कृषि अधिकारी और भ्रष्ट पटल सहायकों के खिलाफ कार्रवाई होगी? क्या बस्ती को खाद माफियों के हवाले कर दिया गया? बस्ती के होलसेलर्स पर अधिकारी जानबूझकर इस लिए कार्रवाई नहीं कर रहे हैं, क्यों कि यह लोग एक मोटी रकम विभाग के अधिकारियों को देते है। जनपद सिद्धार्थनगर की तरह बस्ती के भी जनप्रतिनिधि किसानों के प्रति संवेदनहीन और कालाबाजारियों के प्रति संवेदनशील दिखाई दे रहें है। यहां के नेताओं में इतना दम नहीं कि वह जिला कृषि अधिकारी और एआर के खिलाफ कोई आवाज उठा सके, कार्रवाई करवाना तो बहुत दूर की बात हैं। जिस जनपद में विपक्ष का सांसद और तीन विधायक हो, अगर वह किसानों की आवाज नहीं उठा सकते तो उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए, मान लीजिए कि यह लोग जिले में फाइल खुलने के डर से आवाज नही उठा सकते तो कम से कम सदन में तो उठा सकते है। पता नहीं इन लोगों को किसानों का मुद्धा शून्य क्यों लगने लगता है? जबकि यही लोग किसानों के नाम पर राज कर रहे है। एक तरह से विपक्ष ने खाद की कालाबाजारी करने और करवाने वालों को वाकओवर दे दिया है। रही बात षासन और प्रशासन की तो ऐसा लगता है, कि इन्होंने भी किसानों को उनके हाल पर छोड़ दिया। जिले के दो अधिकारी मिलकर जैसा चाह रहें हैं, खाद के नाम पर किसानों को लूट रहे है। रही बात किसान से जुड़े संगठनों की तो यह आवाज तो उठाते हैं, लेकिन जनप्रतिनिधियों का साथ न मिलने से इनकी आवाज भ्रष्ट अधिकारियों के सामने दबकर रह जा रही है। आखिर यह लोग कब तक खाद की कालाबाजारी का साक्ष्य और सबूत देतें रहेगें?ें जब कार्रवाई ही नहीं होनी है। किसान नेता दीवानचंद्र पटेल कहते हैं, कि वह न जाने कितनी बार सबूत दे चुके हैं, लेकिन प्रशासन की ओर से कोई भी कार्रवाई न किए जाने पर उनका मनोबल गिरता जा रहा है। एक और किसान नेता चंद्रेश प्रताप सिंह और उमेश गोस्वामी तो लिखते-लिखते थक गए, लेकिन न तो अधिकारियों और न भ्रष्ट पटल सहायकों के खिलाफ ही कोई कार्रवाई हुई। कहते हैं, कि अब तो यह लोग खुले आम कार्रवाई करवाने की चुनौती दे रहे है। कहते हैं, कि चाहें जितना और चाहें जहां और जिसको चाहो उससे शिकायत कर लो, हम लोगों का कुछ नहीं होगा, क्यों कि हम लोगों की सेटिगं नेताओं से लेकर बड़े अधिकारियों और मंत्री तक है। जिस विभाग के भ्रष्ट लोग अगर इस तरह की चुनौती देने लगे तो समझ लीजिए कि भ्रष्टाचार का पैसा कहां-कहां जाता है। अगर जनपद सिद्धार्थनगर के रिटेलर्स की तरह बस्ती के रिटेलर्स धरना, प्रदर्शन के जरिए आवाज उठाने लगे तो जिला कृषि अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई होने में देरी नहीं लगेगी, क्यों कि दोनों जनपदों का होलसेलर्स एक ही है। अब जरा अंदाजा लगाइए कि आधा दर्जन होलसेलर्स मिलकर दोनों जनपदों के किसानों को खाद के नाम पर रिटेलर्स और किसानों को लूट रहे हैं, और प्रशासनिक तंत्र और नेता खामोष है। क्यों खामोष है, यह लिखने की नहीं बल्कि समझने वाली बात है। इस मामले में सूबे के विभागीय मंत्री सूर्यप्रताप षाही पर भी अगुंलिया उठ रहे है। किसानों और किसान संगठन के नेताओं का कहना है, कि जब बखरा मंत्री तक जाएगा तो कार्रवाई पारदर्षी कैसे होगी? मंत्रीजी को अच्छी तरह जिला कृषि अधिकारी और पटल सहायकों के भ्रष्टाचार के बारे में मालूम हैं, उसके बाद भी अगर कार्रवाई नहीं होती है, तो इसका मतलब मंत्री और कृषि निदशक दोनों तक पैसा पहुंच रहा है।

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