‘भूखों’ रह ‘जाना’, मगर ‘सूद’ पर ‘पैसा’ मत ‘लेना’
- Posted By: Tejyug News LIVE
- राज्य
- Updated: 24 December, 2025 21:04
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‘भूखों’ रह ‘जाना’, मगर ‘सूद’ पर ‘पैसा’ मत ‘लेना’
- -सूसाइड करना हो या फिर मानसिक संतुलन खोना हो तो सूदखोरों के पास चले जाइए, सूदखोरों के चक्रबृद्वि ब्याज में पड़कर न जाने कितने कारोबारी और आम आदमी बर्बाद हो चुका, न जाने कितने घर उजड़ गए, पुरखों की जमीनें बिक गई, आशियाना तक बिक गया, फिर भी न तो मूलधन और न ब्याज ही समाप्त होता, पिता के मरने के बाद भी बेटे से मूलधन और ब्याज का पैसा लेने के लिए दबाव बनाया जाता, मुकदमा दर्ज कराया जाता
- -सफेदपोश बने सूदखोर न जाने कितनों की जान ले चुके हैं, लोगों की जान लेकर यह लोग सूद के पैसे से करोड़ों में टिकट खरीदते और चुनाव लड़तें, विधायक बनने का सपना देखते
- -अगर किसी सूदखोर ने किसी को एक लाख दिया, तो उसे सिर्फ 90 हजार दिया जाता, एडवांस में सूद का 10 फीसद काट लिया जाता, अगर वह दूसरे माह सूद का 10 हजार नहीं दिया तो उसे अगले माह दस हजार के बदले 11 हजार देना, तीसरे माह भी नहीं दिया तो मूलधन 1.21 लाख पर दस फीसदी के दर से 12 हजार 100 रुपया देना पड़ेगा, चौथे माह भी अगर ब्याज का नहीं दिया तो पांचवें माह उसे एक लाख 34 हजार 200 के मूलधन पर 13420 रुपया ब्याज देना पड़ेगा
- -सूद देते-देते या तो कारोबारी या फिर आम आदमी का संतुलन खो जाता या फिर वह सूसाइड कर लेता, जमीन, स्कूल और गहने तक बेचना या फिर गिरवी रखना पड़ सकता, जिले में ऐसे भी सफेदपोश सूदखोर हैं, जिन्होंने दूसरे सफेदपोश को तीन-तीन करोड़ सूद पर देकर उनसे हर माह पांच से सात लाख ब्याज कमाते
बस्ती। जिगना, पुरानी बस्ती, गंाधीनगर, बेलाड़ी, पिपरा गौतम और महरीपुर के ‘बाबू साहब’ और ‘पंडितजी’ जैसे सूदखोंरों के चंगुल में फंसकर अब तक न जाने कितने घर बर्बाद हो गए, कितनों ने मानसिक संतुलन खो दिया, और कितने सूसाइड कर चुके, फिर भी न तो मूलधन और न ब्याज ही समाप्त हुआ। पिता के सूसाइड कर लेने के बाद भी जब सूदखोरों का मन नहीं भरा तो मूलधन और सूद का पैसा लेने के लिए बेटे पर दबाव बनाया, उनके खिलाफ मुकदमा तक दर्ज करवाया। ताकि बेटा या तो ब्याज सहित मूलधन वापस कर दे या फिर पिता की तरह सूसाइड कर ले, पिता और बेटे की जान लेने वालों का सिलसिला समाप्त नहीं होता, परिवार में अगर पत्नी है, तो उस पर दबाव बनाएगें, फिर सूसाइड करना पड़ेगा। यह सब किसी कहानी का हिस्सा नहीं बल्कि हकीकत है, जो हुआ और जो होने वाला है, उसका आइना मीडिया दिखाने का प्रयास कर रहा है। मीडिया किसी की जरुरत को तो पूरा नहीं कर सकता, लेकिन सच का आइना दिखाकर आने वाली परेशानी से अवष्य बचा सकता हैं, और सच यह है, कि आज छोटे से लेकर बड़े कहे जाने वाले अधिकांष लोग सूदखोरों के चंगुल से आजाद होने के लिए या तो छटपटा रहे हैं, या फिर दम तोड़ दे रहे हैं, या फिर अपना मानसिक संतुलन खो दे रहे है। दम तोड़ देने और मानसिक संतुलन खोने के बाद भी मूलधन और ब्याज से परिवार को मुक्ति नहीं मिलती। चक्रबृद्धि ब्याज के चलते न जाने कितने कारोबारी पलायन कर चुके और न जाने कितनों की पुस्तैनी जमीनें बिक चुकी, पुस्तैनी मकान और गहने को गिरवी रखना पड़ा।
मीडिया आप लोगों को सूदखोरों की दरिंदगी का उदाहरण सामने रख रहा है। अगर किसी सूदखोर ने किसी को एक लाख दिया, तो सूदखोर उसे सिर्फ 90 हजार देगा, एडवांस के रुप सूद का 10 फीसद यानि दस हजार काट लेगा। अगर वह दूसरे माह सूद का 10 हजार नहीं दे पाता तो उसे अगले माह दस हजार के बदले 11 हजार देना पड़ेगा, तीसरे माह भी नहीं दिया तो मूलधन 1.21 लाख हो जाएगा और तब उसे दस फीसदी के दर से 12 हजार 100 रुपया देना पड़ेगा, चौथे माह भी अगर ब्याज का धन नहीं दिया तो पांचवें माह उसे एक लाख 34 हजार 200 के मूलधन पर 13420 रुपया ब्याज देना पड़ेगा। यानि छह माह में ब्याज डेढ़ गुना हो जाता है। बैंक अधिक से अधिक 10-12 फीसद ब्याज लेती है, लेकिन सूदखोर साल का 120 फीसद ब्याज लेते है। दुनिया का कोई भी ऐसा कारोबार नहीं जो एक साल में एक लाख लगाने पर एक लाख 20 हजार का मुनाफा देता हो। इतिहास गवाह है, कि जिसने भी सूद पर पैसा लिया, समझो वह बिना मौत के मर गया। जिले में ऐसे भी सफेदपोष सूदखोर हैं, जिन्होंने दूसरे सफेषपोष को तीन-तीन करोड़ सूद पर देकर उनसे हर माह पांच से सात लाख ब्याज ले रहें हैं। कहा जाता है, कि जिसकी आमदनी ही ब्याज देने पर की न हो, वह कहां से ब्याज देगा, मूल धन को तो भूल जाइए, जाहिर सी बात हैं, कि एक दिन ऐसा आएगा, जब वह सरदारजी तरह इन्हें भी आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाएगा। जब कोई कोई सूद का पैसा नहीं देता तो सूदखोर उसके आवास या फिर प्रतिष्ठान पर गंुडा भेजता, समाज में सरे आम अपमानित करता, तब तंग आकर मजबूरी में कारोबारी या तो अपना मानसिक संतुलन खो देता या फिर आत्महत्या कर लेता। दिक्कत यह है, कि आत्महत्या और फिर दिवालिया हो जाने से कोई सूदखोर के चंगुल से बाहर नहीं आ सकता। हालही में बाराबंकी के एक प्रतिष्ठित कारोबारी ने आत्महत्या कर लिया।

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