‘संविधान’ के ‘नाम’ पर ‘अत्याचार’ कब ‘तक’?

‘संविधान’ के ‘नाम’ पर ‘अत्याचार’ कब ‘तक’?

‘संविधान’ के ‘नाम’ पर ‘अत्याचार’ कब ‘तक’?

बस्ती। श्री राजपूत करणी सेना के पूर्वांचल प्रवक्ता पूर्वांचल प्रवक्ता चंद्रेश प्रताप सिंह का कहना है, कि उत्तर प्रदेश में पुलिस की 32,000 भर्ती निकली है, लेकिन उसकी आयु सीमा देखकर आँखों में आँसू आ जाते हैं। सामान्य वर्ग और ईडब्ल्यूएस के गरीब युवाओं के लिए आयु सीमा मात्र 18 से 22 वर्ष, जबकि ओबीसी और एससीएसटी के लिए 18 से 27 वर्ष। क्या यह न्याय है? क्या सामान्य वर्ग का युवा 22 वर्ष में ही बूढ़ा हो जाता है, और पिछड़े वर्ग के युवा 27 तक जवान रहते हैं? यह भेदभाव नहीं तो क्या है?संविधान की धारा 14 सबको समानता का अधिकार देती है। कहते हैं, कि धारा 16 सरकारी नौकरियों में समान अवसर की गारंटी देता है। फिर क्यों सामान्य वर्ग के गरीब छात्रों को इतनी कम आयु सीमा में बाँध दिया जाता है? ईडब्ल्यूएस तो गरीब सामान्य वर्ग के लिए ही बनाया गया था, फिर उन्हें भी यह सजा क्यों? क्या वे अपराधी हैं? क्या वे गुलाम हैं? वे भी इस देश के नागरिक हैं, जिन्होंने सदियों से समाज को मजबूत बनाया है। लेकिन आज सरकारें और संविधान की व्याख्या उन्हें ही दंडित कर रही है। सोचिए, एक गरीब सवर्ण परिवार का लड़का। बचपन से संघर्ष, पढ़ाई के लिए कर्ज लेकर कोचिंग करके यी सपना देखता है, कि एक दिन उसके मेहनत का फल अवष्य मिलेगा। अगर 22 वर्ष तक नौकरी नहीं मिली तो जीवन भर का सपना चूर-चूर हो जाएगा। जबकि आरक्षित वर्ग को पाँच साल अतिरिक्त मिलते हैं। कहते हैं, कि यह आरक्षण नहीं, यह सवर्णों का शोषण है। सदियों से सवर्णों ने देश की रक्षा की, ज्ञान दिया, लेकिन आज उन्हें ही अपराधी मान लिया गया है। ईडब्ल्यूएस गरीब भी सामान्य की तरह ही पीड़ित हैं। उसे न आरक्षण का लाभ, न आयु में छूट का पूरा फायदा। यह भेदभाव सिर्फ नौकरी तक नहीं, यह आत्मसम्मान पर चोट है। युवा निराश हो रहे हैं, आत्महत्या कर रहे हैं। परिवार टूट रहे हैं। कहते हैं, कि सरकारें वोट बैंक की राजनीति के लिए सवर्णों को कुचल रही हैं। संविधान के नाम पर यह अत्याचार कब तक? अब चुप नहीं रहेंगे। समान अवसर चाहिए, समान आयु सीमा चाहिए। सामान्य और ईडब्ल्यूएस के युवाओं को भी न्याय चाहिए। अगर संविधान सबको समान कहता है, तो यह भेदभाव क्यों? हम इस देश के बराबर के नागरिक हैं। बहुत सहा है, बहुत प्रताड़ित हुए हैं। अब समय आ गया है कि आवाज उठाएं। शांतिपूर्ण तरीके से, लेकिन दृढ़ता से। समान अधिकार या फिर संघर्ष। यह पीड़ा हर सवर्ण युवा के दिल में है। उठो, जागो, और अपने हक की लड़ाई लड़ो। भारत माता के सच्चे सपूतों, अब समय है न्याय मांगने का। अगर यह संविधान है तो फिर बहु विधान किसे कहते हैं?

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