आखिर ‘क्यों’ नहीं एक होकर ‘पत्रकार’ आवाज ‘उठाते’?
- Posted By: Tejyug News LIVE
- उत्तर प्रदेश
- Updated: 20 December, 2025 03:38
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आखिर ‘क्यों’ नहीं एक होकर ‘पत्रकार’ आवाज ‘उठाते’?
बस्ती। बार-बार सवाल उठ रहा है, कि आखिर उत्पीड़न के खिलाफ पत्रकार एक होकर क्यों नहीं आवाज उठाते? क्यों यह सोचते हैं, यह पत्रकार उसके संगठन या फिर उसके गोल का नहीं है? पत्रकार भाइर्यों को यह नहीं भूलना चाहिए कि समाज हन्हें देख रहा है। वैसे भी एक पत्रकार की जो छवि समाज में होनी चाहिए वह नहीं बन पा रही है, ऐसे में अगर अलग-अलग गुटों में बंटे रहेगें तो और भी छवि खराब होगी। कम से कम ऐसे मौके पर तो एकजुटता दिखानी ही चाहिए, जहां पर पत्रकारों के मान और सम्मान की बात होती है। ऐसे मौके पर किसी को यह नहीं देखना चाहिए कि वह हमारे संगठन का हैं, कि नहीं है। क्यों कि अधिकांश समाज के लोगों को यह नहीं मालूम रहता कि पत्रकार भी अलग-अलग गुट के होते है। यहां पर बात सिर्फ सोहन सिंह की नहीं हैं, बल्कि उस बिरादरी की है, जिसे लोग पत्रकार बिरादरी के नाम से जानते हैं, व्यक्ति के रुप में सोहन सिंह बुरा और खराब हो सकते हैं, लेकिन पत्रकार के रुप में नहीं हो सकते। बात अगर खबर को लेकर किसी पत्रकार का उत्पीड़न कोई करता है, तो इसके लिए सभी को एकजुट होकर उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए। आप लोगों को जानकर हैरानी होगी कि पत्रकारों से अधिक विभिन्न वगों के लोगों ने संजय चौधरी के द्वारा लिखाए गए एफआईआर को लेकर निंदा किया गया, और कहा कि ऐसे मौके पर सभी पत्रकारों को एक होकर संजय चौधरी को उनकी ही भाषा में जबाव देना चाहिए। लेकिन यहां पर तो जबाव देने को कौन अधिकांश पत्रकारों ने फोन से यह तक नहीं कहा कि हम आप के साथ है। जिन्हें अपना कहा जाता है, उन्हीं लोगों के द्वारा पत्रकारों को सबसे अधिक पीड़ा पहुंचती है। पत्रकारिता के साथ-साथ लोग व्यक्तिगत संबध भी भूलते जा रहे है। इस एक घटना ने कई लोगों के चेहरे सामने आ गए, जो लोग साथ में उठते बैठते और एक दूसरे के काम आते थे, उनमें कईयों ने तो यहां तक कहा कि अच्छा हुआ फंस गया, बहुत उड़ता था। यह भी सही है, कि सोहन सिंह की पत्रकारिता में इससे अधिक गंभीर मामले सामने आए, लेकिन उनका सामना किया, भले ही अपने कहे जाने वाले पत्रकार साथियों ने मदद नहीं किया हो। वैसे भी कुल मिलाकर अंत में लड़ाई तो अकेले पत्रकार को ही लड़नी पड़ती है। समाज को हसंने का मौका मत दीजिए। कम से कम अगर कोई पत्रकार किसी पत्रकार की मदद नहीं कर सकता तो कम से कम उसके जख्मों पर नमक तो मत डालिए। यह भी सही है, कि अगर कोई पत्रकार अपना काम ईमानदारी से करना चाहता है, तो उसके रास्ते में संजय चौधरी जैसे न जाने कितने लोग बार-बार आएगें। बार-बार मैं कहता हूं कि अगर खबर को लेकर कोई भी व्यक्ति पत्रकार पर हमला करता है, तो इसका जबाव सभी को मिलकर देना चाहिए। समाज को भी लगना चाहिए कि पत्रकारों में एकता है। कोई जरुरी नहीं कि धरना-प्रदर्शन और जूलूस के जरिए विरोध जताया जाए या फिर पीड़ित पत्रकार का सहयोग किया जाए, कहने का मतलब जो भी तरीका हो उसी स्तर पर गलत लोगों का विरोध करना चाहिए। नहीं करेगें तो समाज हम लोगों का मजाक उड़ाएगा। विरोध भी ऐसा हो जो पूरे समाज को दिखे। आवष्यकता हम लोगों को आज समाज में मजबूत होने की है। अगर मजबूत नहीं होगें तो हर कोई आरोप प्रत्यारोप और एफआईआर दर्ज कराएगा। यह भी सही है, कि पत्रकारों को कोई सच्चा हित नहीं होता, खासतौर पर संजय चौधरी जैसे लोग, जो इतने बड़े पद पर रहते हुए झूठ का सहारा लेकर एफआईआर दर्ज करवाया।

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